कुछ ख़याल 5

सड़क पर लेटा है
जीभ निकला है उसका
हड्डियाँ दिखती हैं...

वो कुत्ता है या इन्सान
ज़रा पता करो!

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जुस्तजु भी नहीं
आरज़ू भी नहीं
ना ख्वाब,
ना दस्तक ख्वाब की


यूँ भी तो ज़िन्दगी हसीन हो सकती है!

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कुछ तो यूँ हुआ आज
अपने क़दमों की आहट पर
मैं हैरान हो गया

रास्ते ख़ुद ही बनाने की ज़िद है उनकी! 

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रात कुछ ऐसी थी
मैं खामोश ही था

धड्कनें बोलती रह गयी!

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1 टिप्पणी:

  1. आपके द्वारा यह लाजवाब प्रस्तुति जिसे पढ़ हम सराबोर हुए अब गुलशन-ए-महफ़िल बन आवाम को भी लुभाएगी | आप भी आयें और अपनी पोस्ट को (बृहस्पतिवार, ३० मई, २०१3) को प्रस्तुत होने वाली - मेरी पहली हलचल - की शोभा बढ़ाते देखिये | आपका स्वागत है अपने विचार व्यक्त करने के लिए और अपना स्नेह और आशीर्वाद प्रदान करने के लिए | आइये आप, मैं और हम सब मिलकर नए लिंकस को पढ़ें हलचल मचाएं | आभार

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