ग़ज़ल

मीलों चले पर मंज़िल नहीं आती
थक गए, नींद लेकिन नहीं आती

मिले भी, हँसे भी, मुस्कुराये भी
मोहब्बत अब, लेकिन नहीं आती

जो कहते थे रहेंगे साथ हमेशा
खबर उनकी, लेकिन नहीं आती

-4.3.15

इंतज़ार

और
मेरी आँखों के सामने
थम गयी हैं
मेरी साँसे

वो मुझे देखती हैं
और उड़ती हैं
यहीं कहीं-
मेरी साँसे
बन चुकी हैं
पंछी

और मेरा शरीर
एक पेड़-
रुका, थमा, सहमा,
उस पंछी
के इंतज़ार में...

-27.3.15

दो चिड़िया

दो चिड़ियों का एक जोड़ा,
उड़ने को जब उड़ा
पंख फैलाये उड़ चला
एक पंछी रस्ते में रुका
दूसरा सात समंदर पार चला
फुर्र फुर्र फुर्र उसे उड़ने दो
एक नयी कहानी कहने दो 

-19.1.15