दूर शहर में

मैंने अक्सर पाया है
किसी दूर शहर में चलते हुए खुद को

अक्सर पाया है
कि मैं उस समय उस शहर को नहीं
समझ पाता
जितना वहाँ से वापस घर आकर
समझता हूँ -
बिल्कुल एक बीत चुके रिश्ते की तरह,
कि जब तक रिश्ते में रहे
एक दूसरे को समझ नहीं पाए
जितना एक दूसरे से दूर जाने के बाद समझा

एक नए रिश्ते में हम
एक नए शहर में बस रहे होते हैं
नया घर, नई सड़क
नई बातें, नई मुलाक़ातें
नया सबकुछ

जब शहर पुराना हो जाता है
तब हम किसी दूसरे शहर की तरफ बढ़ते हैं
और ये निरन्तर चलता रहता है

कई साल बाद
किसी फोटोग्राफ को देखते हुए
हम सोचते हैं
"उफ, ये शहर कितना अच्छा था"

लेकिन अब उस शहर तक जाने के
सारे रास्ते बंद हो चुके हैं

16.5.19

दादी से कहो एक कहानी सुना दें

दादी से कहो एक कहानी सुना दें

वो कहानी कि जिसमें राजा ना हो कोई रानी ना हो
वो कहानी कि जिसमें दुनिया मोहब्बत से अनजानी ना हो
वो कहानी कि जिसमें सब सिर्फ अंत में खुश ना रहें
वो कहानी कि जिसमें थोड़ा सा हँसे, थोड़ा सा रो लें
वो कहानी कि जिसमें शुरुआत ना हो
वो कहानी कि जिसमें अंत वाली बात ना हो

बात इतनी सी है कि कहानी सारी पुरानी हो गयी
इतना बोला सबने कि हर कहानी बेमानी हो गयी

बूढ़े बाबा से कहना एक गीत सुना दें

वो गीत ऐसा कि सर्द सुबह में धूप थोड़ी दे दे
वो गीत ऐसा कि कोई फिर ख़ुदा को ना खोजे
वो गीत ऐसा कि कोई रोता ना हो
वो गीत ऐसा कि कोई भूख से सोता ना हो
वो गीत ऐसा कि ग़ज़ल भी, कविता भी
वो गीत ऐसा कि सबकुछ भी, कुछ ना भी

बात इतनी सी है कि गीत सारे खो गए हैं
जिनके पास थे वो सब नशे में सो गए हैं

साथी से कहना कुछ देर बस सुन ले

वो सुनना ऐसा कि जब तुम कुछ ना बोलो
वो सुनना ऐसा कि जब तुम ज़ुबाँ भी ना खोलो
वो सुनना ऐसा कि भीड़ में भी सिर्फ एक शब्द सुना
वो सुनना ऐसा कि तेरी अधपकी बातों से सब बुना
वो सुनना ऐसा कि खेत में फसल का लहलहाना
वो सुनना ऐसा कि बादलों का बस बरस जाना

बात इतनी सी है कि साथी, अब कोई सुनता नहीं
खेत की पुकार अब बादल समझता भी नहीं

दादी-बाबा से मिल लेंगे
एक कहानी सुन लेंगे, एक गीत सुन लेंगे
फिर, हम व्यस्त हो जायेंगे जीवन जीने में
सिर्फ बोलेंगे, खूब बोलेंगे, नहीं कुछ सुनेंगे!

6.2.19