जब जाल समेटूँगा

मैं
अपना जाल समेट
चला जाऊँगा कहीं

कहाँ-
पता नहीं

पता है लेकिन
वहाँ नहीं होगी
भाग-दौड़ कोई
मैं दौड़ूंगा सिर्फ
तितलियों के पीछे

मैं कोई तिलिस्म
पैदा करूँगा
और बन जाऊँगा
चिड़िया
-बैंगनी परों वाली

मैं जाल समेटूँगा
और रख लूँगा
पास अपने
ज़रूरी सामान कुछ
-वो डायरी,
जिसमें तुम्हारा फूल है एक
-वो पल,
जिसमें हँसी हो तुम
-वो रात,
जब हम खामोश ही रहे

सुनो,
मैं जब
जाल समेट रहा होऊँगा,
तब मेरे जाल में
फँस जाना तुम।

22.6.16

ग़ज़ल

कदम दर कदम रिश्ते तोड़ते गए
हम ऐसे अपने सामान छोड़ते गए

आस पास हैं सभी, फिर भी नहीं कोई
हम अपने सारे भरम यूँ तोड़ते गए

ज़िन्दगी तू यूँ ही है या मतलब है तेरा
हर जवाब में ये सवाल खोजते गए

15.6.16

ग़ज़ल

तमाशा देखूँ कब तक सड़क पर, मैं घर में हूँ
दुनिया जल रही है, लेकिन अब मैं घर में हूँ

बचाने को बहुत कुछ था, और सब खो दिया
मैं बेवकूफ़ तो था, लेकिन अब मैं घर में हूँ

जंगलों में, वीरान रास्तों पर, हर गली, हर मोड़ पर
तुम्हें चलना था साथ मेरे, लेकिन अब मैं घर में हूँ

मशालें लेकर निकले थे सब, आ गयी क्रांति भी
खो गया नन्हा वो साथी, और अब मैं घर में हूँ

12.6.16

अधूरापन

मैं पूरा का पूरा
हूँ अधूरा
और तुम भी
अधूरे

एक दूसरे
से अलग सोचते
एक दूसरे
से अलग चल रहे

ख्वाब अलग
राह अलग
मंज़िलें भी अलग

दूर हो जाते हैं
चलो, हम खो जाते हैं

फिर आसमान में
जब कभी मिलेंगे,
अपनी नादानियों पर
मुस्कुराएंगे

और खेलेंगे वो खेल
जो रह गया अधूरा,
मेरे और तुम्हारे
अधूरेपन में।

11.6.2016