रबर का टुकड़ा

सभी स्मृतियों को मिटाता
एक रबर का टुकड़ा
मेरे पैर से लिपटा
चलता है मेरे साथ

कदम-दर-कदम
मिटते जाते हैं
सभी ग्लानिभाव

कदम-दर-कदम
जीवन कितना
आसान हो जाता है

स्मृतियों के बिना जीना
आसान होता है
बिल्कुल उस
निर्भीक जानवर की तरह
जिसे नहीं हुआ इल्हाम
समय के होने का
-समय के समझ
का ना होना ज़रूरी है

पैर से लिपटा
रबर का टुकड़ा
जानता है सबकुछ
-बन गया है मेरे
मौन का साथी।

-13.11.14

हम मिलेंगे साथी

हम मिलेंगे साथी...

हर ऋतु से पहले
अऋतु में,
हर दिन से पहले
अदिन में,
हर साँस से पहले
नि:स्वास में...

हम मिलेंगे साथी
जीवन भर

-यूँ ही।

28.9.14

ग़ज़ल

यूँ जीते भी तो क्या जीते
हम ज़र्रा तुम ज़मीं होते

आंधियाँ वक़्त की आती
एक दूसरे से रूबरू होते

जब जुनूं ख़त्म हो जिंदगी के
हम एक दूसरे के सुकूँ होते

-29.8.14

लूप (Loop)

समय के
बंद दरवाजों से
आज़ाद होते पल
में क़ैद
कविता
समय के दरवाज़े
बंद कर देती है

और
हर पल में
क़ैद होती है
आज़ादी

समय
जो तीव्र गति से
बढ़ता है,
हर पल थमा
रहता है।

-26.7.14

रेशमी रिश्ते

नहीं है
मेरे पास कोई भी
कविता
तुम्हारे लिए
-शब्द सभी
बेकार हैं

बेकार हैं
सभी कवी
बेकार
सभी फिलोस्फर
जिन्होंने
किया है मूल्यांकन
रिश्तों का
-हमारे पेचीदा
रिश्ते के
अनजान मोड़
पर सब मिलेंगे
तुम्हें

उन सब से दूर
भाग कर तुम
मिलना खुद से

रेशम के धागे
से रिश्ते
भीड़ में
महफूज़ नहीं

तुम्हारे हिस्से
ये काम आया है
-संभाल के
रखना इसे...

26.7.14

राग मल्हार

गाये राग मल्हार मोरा सैयां,
मोरा सैयां गाये राग मल्हार
बरसे मेघ नयन से,
रे सावन बारमबार
गाये राग मल्हार मोरा सैयां
मोरा सैयां गाये राग मल्हार

रे रात कर जतन तू, रोक रे तू सूरज को
बोल ओसे मोरा सैयां बैठा मोरा पास
आये अब दो जुग बाद
गाये राग मल्हार मोरा सैयां
मोरा सैयां गाये राग मल्हार

रे जुगनू तू मत उड़ ऐसे-वैसे
आज रात को आ जा घर मोरे
सजा दे आँगन मोरा
बस आज रात
गाये राग मल्हार मोरा सैयां
मोरा सैयां गाये राग मल्हार

काजल मोरी बिखर गयी रे आज
गाये राग मल्हार मोरा सैयां
मोरा सैयां गाये राग मल्हार

-25.6.14

जुपिटर- 13

पैदा हुए तो
इंसान थे हम
फिर कब
टोपी वाला मुसलमान बना
और चोटी वाला हिन्दू
-ये गड़बड़झाला
हुआ कब?
जब भी हुआ,
अब तक क्यों है?

काहे का धरम?
काहे का भरम?

खोज लिया
है मैंने इसका इलाज-
तुम सब जब यहीं
अपने-अपने धरम
के साथ बैठे रहोगे
मैं चला जाऊँगा वहाँ
जहाँ नहीं है कोई धरम
मैं चला जाऊंगा
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 12

धरती से
बहुत बड़ा है
जुपिटर

इसलिए वहाँ
सबकुछ होता है
हमसे बड़ा
पेड़ भी होते हैं
बहुत बड़े
बहुत बड़े होते हैं
घर
साबू भी है
बहुत बड़ा

यहाँ सब लड़ते
रहते
छोटी-छोटी बातों पर
जलेबी पर, पानी पर-
ऐसा कुछ भी नहीं
होता वहाँ
सबका दिल भी है
बड़ा
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 11

आज
दोपहर ढाई बजे
होगा रेवेल्युशन
सभी समझदार
बैठेंगे
एक साथ
और मेरे साथ
चल देंगे

दुनिया हो गयी
थी पागल
उस दिन जिस दिन
मेरा दोस्त
मिट्ठू खो गया
-वो अब नहीं दिखता
कहीं

कल रात सपने
में आया था
बताया उसने
कि वो पहुँच चुका है वहाँ

अब बाकी बचे
सभी समझदार
मिलकर एक साथ
करेंगे रेवेल्युशन
और हम सब
छोड़ देंगे दुनिया
और पहुँच
जायेंगे
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 10

उस दिन
के झगड़े के
बाद
सामने वाले
मोहल्ले का हो गया
बटवारा

हो गया बटवारा
वैसे ही जैसे
इंडिया और पकिस्तान
का हुआ था-
अब कोई बात नहीं करता
एक-दुसरे से
सब डरे-सहमे
से रहते हैं
बच्चे नहीं खेलते
क्रिकेट
और कुल्फी वाला
अब उधर नहीं
जाता कुल्फी बेचने

मुझे बताया है मेरे
दोस्त साबू ने
वहाँ नहीं होती
ऐसी कोई भी बेवकूफी
नहीं होता बटवारा
मोहल्ले और देश का
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 9

रोज़ रात
को उड़नतस्तरी
आती है,
रोज़ रात
साबू और राका
आते हैं
चाचा चौधरी से मिलने

लेकिन चाचा जी की
तबियत अब ठीक
नहीं रहती
उमर हो गयी है
और दमे की दिक्कत है

चाचा जी ने
बोला है साबू को
कि कोई भी दिक्कत हो
तो मुझसे
बात करने को

कल जब उड़नतस्तरी
आएगी
तो बैठ जाऊँगा
मैं और मोती झट से
सफ़र थोड़ा लम्बा
होगा
हम बैठेंगे बिसकुट
और पंडित जी की
जलेबियाँ लेकर,
और
पहुँच जायेंगे
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 8

चौराहे की
लाल बत्ती
जब भी जलती है
हरी बत्ती के बाद,
सब कुछ
रुक जाता है,
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
छोटी सी स्कूटर
रिक्शा, ऑटो

नहीं रुकता
मेरा दोस्त मोती,
लाल बत्ती देख कर भी
वो दौड़ते हुए
मेरे पास आ जाता है

बेवकूफ गाड़ी वाले
होरन बजा कर
डराते हैं उसको,
मोती डर जाता है,
कभी-कभी
मेरे पास बैठ कर
रोता भी है
उसकी पूछ
कांपती रहती है
और जीभ
बाहर निकल आता है
डर के मारे

मैंने बोला मोती को
कोई गाड़ीवाला
होगा नहीं वहाँ
डराने को हमको
दौड़ेंगे, घूमेंगे, सोयेंगे
हम मस्त
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 7

बहुत हो गयी बातें,
नहीं ज़रूरत क्रांति की
बेकार हैं सब क्रांतिकारी-
भगत सिंह, मार्क्स, गाँधी
और लल्लन चाचा

क्रांति नहीं लाएगी
जलेबियाँ सबके लिए
गरम-गरम,
मिलेगी जलेबियाँ
सिर्फ पंडित जी
के दुकान पर-
तीन रुपये की चार

लेकिन पंडित जी
अब नहीं रहते वहाँ
कुछ दिन पहले
मर गए वो,
लेकिन
वो मुझसे मिलेंगे
जल्द
और देंगे जलेबियाँ
खूब सारी-
जुपिटर पर।

-13.05.2014

जुपिटर- 6

रात को जब
टिमटिमाते तारे,
मुझको बुलाते
और कहते-
धरती पर
सब हो गए पागल
-बस एक मैं
बचा हूँ
और दुसरे तुम-
हम दोनों के
भरोसे
चल रही दुनिया
धीरे-धीरे
सूरज के किनारे,
और इसके अलावा
कुछ भी नहीं यहाँ-
मैं, तुम, सूरज
और सिर्फ बाकी
बचा शोर

जब हम
पहुचेंगे वहाँ
तब सब होगा-
डायनासौरस मुस्कुराएगा,
बड़ी सी वेल मछली
खेलेगी छुपा-छुपी
साथ हमारे,
कोक्रोच होगा
हमारा क्लासटीचर
वहाँ-
जुपिटर पर।

-13.05.2014

मैं तुम्हारा...

समझो मत मुझे
शब्दों में,
पहचानों मुझे
शब्दहीनता में

शब्द से परे,
आकार से दूर
मौन की ध्वनि में

पहचानों मुझे
मत मेरी छाया में,
समझो मुझे
स्वयं में।

-22.05.2014

जुपिटर- 5

सबसे पहले
मौत हुयी
गांधीवाद की,
फिर मरा गाँधी

मार्क्स के
मरने के पहले
गला रेत कर
मार दिया गया था
मार्क्सवाद

यीशु के
सूली चढ़ने
से पहले
हत्या हो गयी थी
क्रिस्चानिटी की

मोहम्मद
जब मरा
तब इस्लाम
मर चुका था

राम के
रहते गला घुट
चुका था
सनातन धर्म का

सभी शुरुआत
से पहले
अंत हुआ
सबका

अब,
जब सब कुछ
ख़त्म हो
चुका है
हम रह रहे हैं
एक छलावे में-
छलावा हिन्दुस्तान
छलावा पाकिस्तान
छलावा जन्म
छलावा मृत्यु
छलावा तुम
छलावा मैं

छलावे से दूर
जब जायेंगे हम
पाएंगे हम
सच
-पूर्ण सच
ना सत्य तुम्हारा
ना सत्य मेरा

सत्य
मिलेगा हमें
जुपिटर पर।

-06.05.2014

जुपिटर- 4

जियोग्राफी के
पहले
हिस्ट्री के
शुरुआत में-
एक पल था

उस पल में
क़ैद थे
मौन वक़्त के
सभी लम्हें,
बंद थे उसमे
इतिहास के बाद का
इतिहास,
भूगोल के पहले का
भूगोल
आदि भी
अंत भी
सच भी
झूठ भी
सफ़ेद भी
स्याह भी

और फिर
वो लम्हा
खो गया

मेरे दोस्त
साबू ने कहा है
मौजूद है
वो लम्हा
उसके घर के
पास वाले बगीचे में

-वो बगीचा
बुलाता है मुझको
बार-बार
जब भी सोता हूँ मैं,
आ जाता है
सपने में,
बेकार है सभी
नींद की गोली-
नींद उड़ जाती है
कभी-कभी
नींद में भी

अब ज़रूरी है
जाना वहाँ,
ज़रूरी है मिलना
उन सबसे,
ज़रूरी है
देखना सबकुछ,
ज़रूरी है
पाना उस
खो चुके पल को

कल सुबह की
पहली ट्रेन से
जाना है मुझको
उस पार,
जुपिटर पर।

-06.05.204

जुपिटर- 3

अब पानी भी
खामोश है,
चुप हो गए बादल,
चिलचिलाती धूप
है शांत,
पत्ते सारे के सारे
थम गए,
रुक गयी है हवा

-मैंने बता दिया है
सबको
धरती पागल है,
धोखा है
सिविलाइज़ेशन

अब सबके सब
चलेंगे मेरे साथ
एक नयी दुनिया
बसाने-
जुपिटर पर।

-06.05.204

बिग बैंग

वो वक़्त-
जब
खामोश हो जाएगी
रात,
सुबह खामोश,
चुप होगी
हरेक बोलती
घड़ी,
पत्ते
जब
पेड़ से टूट कर
ज़मीं से ठीक
डेढ़ फीट ऊपर
थम जायेंगे-
उस लम्हे
की तरह
जिस लम्हे में
मिलेंगे हम

वो वक़्त
जब सब कुछ थम
चुका होगा-
सच झूठ
सफ़ेद स्याह
गुण निर्गुण
-सब एक

जब सबकुछ
एक होगा
समय के
शुरुआत की
तरह
तब
मिलेंगे हम

हम मिलेंगे
दो प्रोटोन की तरह
और फिर
शुरुआत होगी
एक नए यूनिवर्स की
-सच
और झूठ
से परे
आदी और अंत
से दूर।

-29.4.14

अंतहीन सफ़र

जब ख्वाब सारे
पंख फैलाने लगे
अंतिम दो साँस
नींदें चुराने लगे
नीला जब पड़
चुका हो बदन

तब तुम आ जाना
पास मेरे
जब आँखें मेरी
अंतिम करवट ले
तब तुम रहना
पास मेरे
जब दुनिया सारी
रोएगी
तब हाथ पकड़
उड़ लेंगे हम
मद्धम मद्धम
नील गगन

-27.04.2014

जुपिटर- 2

धरती की अजब कहानी
प्यासी पानी
बादल पागल
बरसे आग
भीगे इंसा
तन जले
मन तरसे

दौड़े सब
सब गिरे
सब मरे
पागल सब
सब पागल

देखो,
अलग सी है
दुनिया जुपिटर की-

ना कोई ऊपर
ना बैठा कोई नीचे
ना कोई गांधीवादी
ना मार्क्सवादी कोई खीजे

सब धर्म अधर्म हो गए
अधर्म सारे धर्म
खुदा हो गया नास्तिक
दुःख हो गए सारे ख़तम

गांधी पढ़ रहा दास कैपिटल
मार्क्स पढ़ रहा बाइबल
हिटलर भी अब ज्यूस हो गया
गुस्सा उसका कहीं खो गया

ये सब भी
तुम्हारी तरह
हँसते थे
बातों पर मेरी
जब मैं कहता
सब कुछ
अलग होगा
जुपिटर पर

रास्ता खुद
तुम्हें है करना तय
आना है चल कर
जुपिटर
जहाँ अलग सा
है अपना घर

पागल धरती
बोलेगी दौड़ो
-तुम दौड़ोगे
बोलेगी लड़ो
-तुम लड़ोगे
बोलेगी जियो
-तुम जियोगे
बोलेगी कूदो
-तुम कूदोगे
वीरान पहाड़ से,
और आ जाओगे
पास मेरे

पागल सब
सब पागल

पागलपन से परे
जब हम मिलेंगे
तब गायेंगे एक गाना
-गाना शब्दहीन

तुम आ जाना
मत घबराना
-घर मेरा है अब
जुपिटर।

22.04.2014

ग़ज़ल

मुझे वो वक़्त दे दे फिर से जो अभी मैंने खोया है
कल रात जगे हैं ख्वाब मेरे, एक सपना अब जाकर सोया है

हर इंसान के आँसू खोजते हैं एक सवाल अपनों से
कोई पूछ ले वो कौन सा खिलौना है जिसके लिए वो रोया है

मैं क्यों ना कह दूँ तेरी हर बात सच्ची है, तू खुदा है
तेरे झूठ को भी बड़ी खूबसूरती से हमने संजोया है

इसलिए कि सब कह रहे हैं झूठ मैं भी हो जाऊं झूठा
ये खेल तो प्यारा है, मगर बहुत ही झूठा है

-04.01.2014

ग़ज़ल

ना जाने कैसे शौक इंसानों ने रखे हैं,
एक अरसे से सभी मुस्कुराते रहे हैं

शहर की भीड़ में कहीं खो ना जाओ,
इसलिए जंगलों में भी ठिकाने रखे हैं

हमें क्या पड़ी अब तुम्हे कुछ कहेंगे,
जला दो, रिश्ते हैं, कब से रखे हैं

-11.04.2014

जुपिटर- 1

और अब
जब सब कुछ ही
विराना सा है-
वीरानी गलियाँ,
वीरान से रस्ते,
घर वीरान,
मन वीरान-
तब
सिर्फ जाना बाकी है
जुपिटर पर।

वहाँ जहाँ 
मैं रहता हूँ,
रहता था,
और रहना है-
बदमिजाज़ धरती
नहीं समेट सकती
मेरी भावनाओं
के समंदर को

-बोल देती है
पागल
जब भी बोलता हूँ
कोई इंतज़ार में है
जुपिटर पर।

जब कोई
नहीं समझता
बातों को,
तब कहता हूँ तुमसे,
"साथ चलते हैं ना
जुपिटर पर"
-तुम भी मुस्कुराते हुए
टाल देते हो
इस सफ़र को। 

वहाँ बैठा 
साबू इंतज़ार
कर रहा होगा-
इंतज़ार में होंगे
और भी दोस्त
जिनसे मिलवाना
है तुम्हे।

एक दिन
जब अकेला
चला जाऊंगा जुपिटर,
तब तुम खोजोगे
मुझे-
जानता हूँ। 

दुनिया का क्या है
वो तो कह देगी-
"कल रात
मर गया कोई"
मत मानना इस 
झूठ को-
मैं जुपिटर पर
दोस्तों के
साथ इंतज़ार
करूँगा तुम्हारा...

आ जाना जल्दी।
-08.04.2014

सिनेमा

और,
शुरू हुआ एक
और सिनेमा-
70एम.एम वाला

शुरू हुआ
एक सफ़र,
वीरान नगर के
वीराने से-
जहाँ आबाद है
दुनिया यादों क़ी
-किसी कोने में
छिपे भूले-बिसरे
वादों की,
सुनसान गली
की कहानी अनसुनी,
बेचैन पलों की
बातें अनकही,
वो जो गीत थे
जिसे गाया कभी नहीं,
वो जो संगीत था
जिसे सुनाया कभी नहीं

ऐसे भी कुछ पल
ये सिनेमाटोग्राफर क़ैद कर लेगा,
कैमरे का एंगेल
रख देगा वहाँ
जहाँ से दिखेगी
अन-दिखी तस्वीरें
ज़िन्दगी की

एडिटर फ्रेम दर फ्रेम
कह देगा कहानी-
जिसे कहना ज़रूरी है,
ज़रूरी है जिसे
महसूस करना
रूह तक को

स्पेशल इफेक्ट
वाला सिनेमा,
दिखा देगा सबकुछ
जो देखा नहीं कभी

...फिर भी देख नहीं
पायेगा कोई और
सिनेमा मेरा,
सिनेमा तेरा-
वो जो बना है
सपनों के फ्रेम में।

22.3.14

सौर मंडल, और तुम

तब
जब
हम साथ थे
जुपिटर पर,
सैटर्न जलता
था तुमसे।

मार्स झाँकता था
और भाग जाता,
जब जब
पकड़ी मैंने
कलाई तुम्हारी।

वीनस शरमाता बहुत
तुम्हारी नादाँ मुस्कान
के बाद,
और कहता मुझसे,
"सूर्य की किरण
से भी ज्यादा
प्रकाशवान है
हँसी उसकी।"

स्तब्ध रह गए
नेप्चून, मरकरी
और युरेनस
उस दिन,
जब तुमने
सबका साथ
छोड़ कर
मुझे प्लूटो पर
एक नयी दुनिया
बसाने को बोला

साहस था तुममे
जो साथ दिया
प्लूटो का
जब कोई नहीं
रहा उसका...

मैं चल ना सका
साथ तुम्हारे...

अब तक
बैठा हूँ यहाँ
पृथ्वी पर,
अकेला।

-17.3.14

मुल्क के खासमखास

हमको दिख रहे सब पागल आस-पास
वो कह रहे ये हैं मुल्क के खासमखास

अब तो क्या बवाल सड़कों पर हो
सड़क की रोड खाक बनेगी गाँव की आस

ये जो देखा तो हो गया बावला वो
पानी को ना जाने है किसकी प्यास

22.1.14

26 जनवरी

आज एक हिन्दू एक मुस्लिम से प्यार रखता नहीं,
क्या मनायें वो दिन जो ख़ास मायने रखता नहीं?

आप करते हैं स्टेटस अपडेट मोमेंट ऑफ़ प्राइड में,
सत्तर प्रतिशत गरीब आबादी को आज फर्क पड़ता नहीं

आप एलीट हुए, डेवलपमेंट की दौड़ में बिजी हो गए,
वो 'गौंडवी' का हरखू अब बिल्कुल भी दौड़ता नहीं

यूँ भी क्या कहना, उदास होना, पढ़कर 'अदम' को निहाल,
तू हिस्सा मुल्क के खुशहाली का जो ज्यादा सोचता नहीं

26.1.14