ग़ज़ल

यूँ जीते भी तो क्या जीते
हम ज़र्रा तुम ज़मीं होते

आंधियाँ वक़्त की आती
एक दूसरे से रूबरू होते

जब जुनूं ख़त्म हो जिंदगी के
हम एक दूसरे के सुकूँ होते

-29.8.14

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