ग़ज़ल

ना ये हुआ, ना वो हुआ
चलो जो हुआ, सो हुआ

हिरण भागे कस्तूरी पीछे
ना मिले, तो क्या हुआ

दिया लड़े जलने को हरदम
बुझ गया, तो बुझ गया

बने तुम दुश्मन, ठीक है
हमने तो माँगी ख़ैर दुआ

गया दूर, खोजा ख़ुद को
मैं खो गया, तो खो गया

12.10.15

अब कविता नहीं कह पाता

वो अब कविता नहीं कह पाता
भूल चुका है कहना कहानियाँ वो
नज़्म और ग़ज़ल चुरा लिए गए
अब कुछ भी नहीं है उसके पास

अब उसके पैर आवारा नहीं रहे
सोच समझ कर चलते हैं
उँगलियाँ यूँ ही नहीं कुछ भी बोल देती हैं
-समझदार हो गए हैं सभी

अब नहीं बादलों के पास जाता वो
जूपिटर से नाता टूट चुका है
उड़ता नहीं, सिर्फ़ चलता है अब

लेकिन एक चिड़िया
जो बचपन में उड़ कर आयी थी
कहीं से-
बैठ गयी थी उसके कंधों पर
लाख बोलने पर भी नहीं जाती वो
-आज भी वहीं बैठी है
उसके कंधों पर

अब शायद वो उसे उड़ा ले जाएगी
हमेशा के लिए...

6.10.15

हम क्यों मिले?

हम नहीं मिलते
और नहीं होता कोई खेल

ना कोई तमाशा
ना दुनियादारी कोई

ना तुम रूठते
ना मैं मनाता
ठंडी रातों में
लम्बे रास्तों पर
ना कोई जाता

बेमतलब शामों में
नहीं पकड़ते हाथ
और देखते शहर को
एक नए कोने से

नहीं लिखता बेकार कवितायें
गाजर के हलवे और मूँगफली पर
-जो हमने साथ खाए थे

नहीं आते एक-दूसरे
के सपनों में-
नींदें बर्बाद नहीं होती

-लेकिन हम मिले
और जीना सीख लिया

22.1.16

हम कहीं खो जाते हैं

उड़ना और चहकना
चहक कर उड़ जाना

खोना और पाना
पा कर खो जाना


अद्भुत है मिलना
आश्चर्य का होना

नया सब है
और सब पुराना

फुर्र फुर्र उड़ना
चर्र चर्र चलना

एक गीत सुनना
एक गीत सुनाना

अशब्द में सबकुछ कहना...
और तुम्हारा मुझे समझना

चलो चुप हो जाते हैं
हम कहीं खो जाते हैं।

-9.1.2016