ग़ज़ल

ना ये हुआ, ना वो हुआ
चलो जो हुआ, सो हुआ

हिरण भागे कस्तूरी पीछे
ना मिले, तो क्या हुआ

दिया लड़े जलने को हरदम
बुझ गया, तो बुझ गया

बने तुम दुश्मन, ठीक है
हमने तो माँगी ख़ैर दुआ

गया दूर, खोजा ख़ुद को
मैं खो गया, तो खो गया

12.10.15

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें