बिग बैंग

वो वक़्त-
जब
खामोश हो जाएगी
रात,
सुबह खामोश,
चुप होगी
हरेक बोलती
घड़ी,
पत्ते
जब
पेड़ से टूट कर
ज़मीं से ठीक
डेढ़ फीट ऊपर
थम जायेंगे-
उस लम्हे
की तरह
जिस लम्हे में
मिलेंगे हम

वो वक़्त
जब सब कुछ थम
चुका होगा-
सच झूठ
सफ़ेद स्याह
गुण निर्गुण
-सब एक

जब सबकुछ
एक होगा
समय के
शुरुआत की
तरह
तब
मिलेंगे हम

हम मिलेंगे
दो प्रोटोन की तरह
और फिर
शुरुआत होगी
एक नए यूनिवर्स की
-सच
और झूठ
से परे
आदी और अंत
से दूर।

-29.4.14

अंतहीन सफ़र

जब ख्वाब सारे
पंख फैलाने लगे
अंतिम दो साँस
नींदें चुराने लगे
नीला जब पड़
चुका हो बदन

तब तुम आ जाना
पास मेरे
जब आँखें मेरी
अंतिम करवट ले
तब तुम रहना
पास मेरे
जब दुनिया सारी
रोएगी
तब हाथ पकड़
उड़ लेंगे हम
मद्धम मद्धम
नील गगन

-27.04.2014

जुपिटर- 2

धरती की अजब कहानी
प्यासी पानी
बादल पागल
बरसे आग
भीगे इंसा
तन जले
मन तरसे

दौड़े सब
सब गिरे
सब मरे
पागल सब
सब पागल

देखो,
अलग सी है
दुनिया जुपिटर की-

ना कोई ऊपर
ना बैठा कोई नीचे
ना कोई गांधीवादी
ना मार्क्सवादी कोई खीजे

सब धर्म अधर्म हो गए
अधर्म सारे धर्म
खुदा हो गया नास्तिक
दुःख हो गए सारे ख़तम

गांधी पढ़ रहा दास कैपिटल
मार्क्स पढ़ रहा बाइबल
हिटलर भी अब ज्यूस हो गया
गुस्सा उसका कहीं खो गया

ये सब भी
तुम्हारी तरह
हँसते थे
बातों पर मेरी
जब मैं कहता
सब कुछ
अलग होगा
जुपिटर पर

रास्ता खुद
तुम्हें है करना तय
आना है चल कर
जुपिटर
जहाँ अलग सा
है अपना घर

पागल धरती
बोलेगी दौड़ो
-तुम दौड़ोगे
बोलेगी लड़ो
-तुम लड़ोगे
बोलेगी जियो
-तुम जियोगे
बोलेगी कूदो
-तुम कूदोगे
वीरान पहाड़ से,
और आ जाओगे
पास मेरे

पागल सब
सब पागल

पागलपन से परे
जब हम मिलेंगे
तब गायेंगे एक गाना
-गाना शब्दहीन

तुम आ जाना
मत घबराना
-घर मेरा है अब
जुपिटर।

22.04.2014

ग़ज़ल

मुझे वो वक़्त दे दे फिर से जो अभी मैंने खोया है
कल रात जगे हैं ख्वाब मेरे, एक सपना अब जाकर सोया है

हर इंसान के आँसू खोजते हैं एक सवाल अपनों से
कोई पूछ ले वो कौन सा खिलौना है जिसके लिए वो रोया है

मैं क्यों ना कह दूँ तेरी हर बात सच्ची है, तू खुदा है
तेरे झूठ को भी बड़ी खूबसूरती से हमने संजोया है

इसलिए कि सब कह रहे हैं झूठ मैं भी हो जाऊं झूठा
ये खेल तो प्यारा है, मगर बहुत ही झूठा है

-04.01.2014

ग़ज़ल

ना जाने कैसे शौक इंसानों ने रखे हैं,
एक अरसे से सभी मुस्कुराते रहे हैं

शहर की भीड़ में कहीं खो ना जाओ,
इसलिए जंगलों में भी ठिकाने रखे हैं

हमें क्या पड़ी अब तुम्हे कुछ कहेंगे,
जला दो, रिश्ते हैं, कब से रखे हैं

-11.04.2014

जुपिटर- 1

और अब
जब सब कुछ ही
विराना सा है-
वीरानी गलियाँ,
वीरान से रस्ते,
घर वीरान,
मन वीरान-
तब
सिर्फ जाना बाकी है
जुपिटर पर।

वहाँ जहाँ 
मैं रहता हूँ,
रहता था,
और रहना है-
बदमिजाज़ धरती
नहीं समेट सकती
मेरी भावनाओं
के समंदर को

-बोल देती है
पागल
जब भी बोलता हूँ
कोई इंतज़ार में है
जुपिटर पर।

जब कोई
नहीं समझता
बातों को,
तब कहता हूँ तुमसे,
"साथ चलते हैं ना
जुपिटर पर"
-तुम भी मुस्कुराते हुए
टाल देते हो
इस सफ़र को। 

वहाँ बैठा 
साबू इंतज़ार
कर रहा होगा-
इंतज़ार में होंगे
और भी दोस्त
जिनसे मिलवाना
है तुम्हे।

एक दिन
जब अकेला
चला जाऊंगा जुपिटर,
तब तुम खोजोगे
मुझे-
जानता हूँ। 

दुनिया का क्या है
वो तो कह देगी-
"कल रात
मर गया कोई"
मत मानना इस 
झूठ को-
मैं जुपिटर पर
दोस्तों के
साथ इंतज़ार
करूँगा तुम्हारा...

आ जाना जल्दी।
-08.04.2014