ग़ज़ल

तमाशा देखूँ कब तक सड़क पर, मैं घर में हूँ
दुनिया जल रही है, लेकिन अब मैं घर में हूँ

बचाने को बहुत कुछ था, और सब खो दिया
मैं बेवकूफ़ तो था, लेकिन अब मैं घर में हूँ

जंगलों में, वीरान रास्तों पर, हर गली, हर मोड़ पर
तुम्हें चलना था साथ मेरे, लेकिन अब मैं घर में हूँ

मशालें लेकर निकले थे सब, आ गयी क्रांति भी
खो गया नन्हा वो साथी, और अब मैं घर में हूँ

12.6.16

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