ग़ज़ल 1

तेरी परछाई अब मेरी साँसों को हैं बेक़रार करते 
ग़र जिंदा होते तो सिर्फ तुमसे ही प्यार करते 

दरवाजों को कहो आँखों का इंतज़ाम कर लें 
मुझे तो इक अरसा हुआ तेरा इंतज़ार करते 

ख़ाक में मिला कर मेरी हस्ती को गए थे तुम 
सोचा था तेरे साथ ही ज़िन्दगी ख़ाकसार करते 

नहीं ऐसा भी कि मैं अंजान हूँ अजनबी हो तुम
बातें ऐसे करते हो जैसे हम पहली बार करते 

उस लम्हे में कुछ महसूस तो हमने किया ज़रूर था
उस लम्हे का इस्तेमाल करते हो मुझे शर्मसार करते

आज देखा उस खँडहर को जहाँ कभी मिले थे हम,
तुम तो ख़ामोश हो ,बेहतर होता उस से ही बात करते

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