ग़ज़ल 5

जो कुछ भी है सीखा यहाँ वो भुलाना चाहता हूँ
अगर मैं हकीक़त हूँ, तो ख़्वाब होना चाहता हूँ

मेरे अन्दर का मुसलमान हावी मेरे हिन्दू पर
मेरा हिन्दू लड़ता है,ये फ़साद रोकना चाहता हूँ

चिंगारियाँ जला दें इंसानियत को-नहीं माँगता
जो बुझा दें उन्हें मैं तो वो आब होना चाहता हूँ

नफ़रत उससे जो करे मेरे नाम का इस्तेमाल
मैं कौन हूँ? क्यूँ हूँ? मैं तो हवा होना चाहता हूँ

जद्दोजहद-परेशानियाँ-दर्द- कई गुना बढ़ चले
ख़तम करो सब! मैं अब दवा होना चाहता हूँ

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