ग़ज़ल 3

कौन सा दिन है, ये क्या साल है
मुझे क्या पता मेरा क्या हाल है

तुम मेरे हो यही समझता था मैं
मैं कौन हूँ, ये अब तेरा सवाल है

तह तक जाऊं तो मैं कैसे जाऊं
रुकावट है, ज़हन में जंजाल है

दौलत तो कुछ नहीं है पास मेरे
एक ग़ज़ल है, हालत फटेहाल है

भीगा हुआ हूँ बौछार-ऐ-ग़म से
मुद्दा ये कि मेरा नाम निहाल है

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जब हौले से छूती है तो कहती है हवा मुझसे
तू है तो खुदा कौन है? अब ज़रूरी ये बवाल है!

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