ग़ज़ल 4

ख़्वाबों के दरीचों पर नाम लिखा है
हमने खुद अपना अंजाम लिखा है

ना कर रस्साकशी,छेड़ ना लाशों को
जिंदा हैं वहाँ जहाँ शमशान लिखा है

आवाज़ निकल पड़ी उस सूरत से
जिसको तुमने बेजुबान लिखा है

सब कहते हैं वो मर गया है, या रब!
उसने तो कातिल का नाम लिखा है

जिसको कह रही है पूरी कौम पागल
उसके नाम के आगे विद्वान लिखा है

चिट्ठी डाली है खुदा को, माँगा है हक
अपने ही मौत का फरमान लिखा है

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