सलाखें


दुनिया
और दरम्यान

मेरे
हैं सलाखें।

सलाखों के
उस तरफ
मैं,
इस तरफ
दुनिया सारी।

क़ैद कौन है,
इसका फैसला
कौन करे?

18.8.13

सच और झूठ

देखो,
एक पंछी उड़ता है
और मैं लिखता हूँ
एक कविता उस पर

वो पंछी कुछ नहीं
कहता
ना सुनता
बस उड़ता है
विशाल गगन में

मैं कविता लिखता हूँ
वो कविता है
मैं झूठा हूँ
वो सच्चा है।

10.8.13

पागल आकाश

रे पागल आकाश,
रात भर छत पर मेरे क्यों सोता है तू?

तू भी आवारा
हम घुमक्करों सा लगता है
मैंने देखा है
तेरी विह्वलता को

रे आकाश
दिन भर सूरज की धूप में क्यों तपता है तू?

तेरी बातें सुनता हूँ मैं
छुप-छुप कर|

अच्छा,
ये बता कल क्या बातें कर रहा था तू बादल से?

मुझे सब पता है-
तुने साजिश की है
मेरे रूह तक को भिगो देने की अगली बारिश में|

रे आकाश,
तू सच में पागल है!

मुझे चिड़िया बना दे

चल बहुत हुआ नाटक इंसान बनने का-
तिलिस्म पैदा कर- मुझे चिड़िया बना दे|

चिड़िया बना दे-
के ज़रूरी है उड़ना मेरी रूह के लिए
के ज़रूरी है मुझे अपने ख्वाब को जीना
जीने के लिए
के ज़रूरी है के मैं पंख खोलूँ अपने
उड़ जाऊं फुर्र फुर्र फुर्र

अब किसे रोमांटिक कहोगे तुम?
जिंदगी के एहसास को-
एक आस को-
एक खामोश प्यास को?

-हाँ ये रोमांटिसिज़्म हो सकता है
लेकिन देखो ना,
मेरे पंख सच्चे हैं
ये उड़ना चाहते हैं 

अपनी रिअलिटी के
अधपके नोशन से
मेरी उड़ान को मत रोको

चल बहुत हुआ नाटक इंसान बनने का-
तिलिस्म पैदा कर- मुझे चिड़िया बना दे|

-7.5.2013

मेरी अंतिम कविता

मुझसे मुलाक़ात तुम्हारी फिर ना होगी,
मैं तुझसे मिल ना सकूँगा, ऐ कविता|

मुझे अब भी याद है
जब पहली दफा
मिला था मैं तुझसे-
बारह साल पहले...
तब से अब तक
मैं अपनी दुनिया में
खास था
-अब मैं मामूली होना चाहता हूँ

सब खूबसूरत था-
सब झूठ था

मुझे सच की ज़रूरत नहीं है
मेरा झूठ बहुत सच्चा है
लेकिन अब इस झूठ का बोझ
बढ़ चला है

हर पल को कविता के
कैमरे में क़ैद करना,
नहीं चाहते हुए भी
शब्दों को आकार देना-
स्वीकार करना अपने आपको,
वो करना जो परे है
मेरे इंसानी हाथों और एहसास से-
अब नहीं होता|

दो महीने पहले उसने कहा
तू एक एस्केप है-
तब से अब तक मैं
इस जद्दोजहद में था
-वो भी तो कविता लिखता था...
उसने तेरा साथ क्यूँ छोड़ा?

और जॉन?
वो जो किरदार था उस नॉवेल में,
जो खुद को कवि समझता था
और लिखना भी चाहता था,
लेकिन उसे भी लगा कि वो कवि नहीं है-
मुझे भी लगता है मैं कवि नहीं हूँ,
ऐ मेरी अंतिम कविता|

अब मुझे लगता है
कोई कवि नहीं है
सब सिर्फ झूठे हैं-
ये अंतिम कविता भी
एक झूठ है-
सत्य कविता में नहीं है,
कहानी में नहीं है-
वो परे है इन सबसे
वो परे है हम सबसे

कविता में
शब्दों के बीच
जो जगह खाली है
वो मौन सत्य है
जो हमेशा हमारे साथ है,
ऐ मेरी अंतिम कविता|
27.10.12

एक ख़्वाब ज़िन्दगी

मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ
मेरा हकीक़त से वास्ता है क्या?
तुम मुझे ख्वाब में मिला करो,
मुझे पूर्णता: से करना है क्या?

तुम खोजते फिरते हो मतलब-ए-ज़िन्दगी
ज़िन्दगी मतलब से कोसों दूर है
चाहते हो शौहरत हर मोड़ पर
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मौत मशहूर है

मैं ख्वाब में जीता हूँ, ख्वाब में मरता हूँ
जो चाहता हूँ, हर वो चीज़ करता हूँ
जो पाने की हसरत तुम रखते हो
उसे मैं पाता हूँ, जब जी चाहे खो जाता हूँ

वो जो शोले दिखते थे दूर से, उसका नाम सूरज रख दिया
जब जी चाहे बुझाता हूँ, जब जी चाहे जलाता हूँ
वो जिसे तुम ढूँढ़ते हो, खोजते हो हर घड़ी
मैं अपनी सल्तनत में ख़ुदा कहलाता हूँ

जब हकीक़त सिर्फ भ्रम है
तो मैं क्यों भ्रम में जिया करूँ?
आँख मूंदे ज़िन्दगी बैठी है
और मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ, मैं ख्वाब हूँ!

ज़िन्दगी की उम्मीद

वो पेड़
ठीक से उगा भी नहीं
और मुरझा गया-
उसके पत्ते
अब भी
बारिश का इंतज़ार करते हैं

दो तीन सदियों पुराना
एक गुम्बद
उसके ठीक सामने खड़ा है,
कुछ बेजुबान बेंच
उसे घेर कर बैठे हैं,
बुझे हुए कुछ लैम्पपोस्ट
गड़े हैं ज़मीन में
उसके पास ही-
ये डराते हैं
ज़िन्दगी की हर उम्मीद को
वो पेड़
अपने साथ
जिंदगी की उम्मीद लेकर आया था
लेकिन
मौसम की बदमिज़ाजी ने
उसे मुरझा दिया

खामोश
वो अब भी बरसात का इंतज़ार करता है

उसके इर्द-गिर्द
दो-एक कवितायें घूमती हैं अक्सर
एक पन्ने पर उतरने की
कोशिश करती हैं

लेकिन
वो बेंच वो लैम्पपोस्ट वो गुम्बद-
सब के सब
उन्हें घेर कर
आत्महत्या करने पर मजबूर कर देते हैं

पर
वहाँ
हर रात
एक नयी कविता का जन्म होता है-
जिंदगी की उम्मीद के साथ

बड़ी मुश्किल से
एक कविता
बच कर
इस कागज पर उतरी है
इसे ज़िन्दगी से मोहब्बत है-
इसे ज़िन्दा रहने दो!

30.6.2012

बारिश का एक घर बनाएँ

चलो,
बारिश का एक घर बनाएँ
बूंदों से घर सजाएँ

बारिश का एक घर बनाएँ

ख़्वाब सारे एक साथ
झरोखे पर रख देंगे
जब जी करेगा
चुनेंगे, देखेंगे- हँस लेंगे

आँगन में होगी
शैतानी खूब सारी-
हम सूरज की किरणों से नहाएंगे
खेलेंगे कितकित और
लट्टू घुमाएंगे
होगी लुका-छुप्पी उनके साथ
जो हमें दोस्त कह कर खोज ले जायेंगे

ये सब होगा जब हम मिलेंगे
ख़्वाब देखेंगे
सपनों को महसूस करेंगे
आज़ाद कर देंगे सालों से क़ैद
अपने बचपन को
बिखेरेंगे बेमतलबी मुस्कान

चलो ना,
बारिश का एक घर बनाएँ
बूंदों से घर सजाएँ

कवितायें लिखना छोड़ दो

अब तुम कवितायें लिखना
छोड़ दो!
अब तुम कहानियाँ पढ़ना
छोड़ दो!
तुम्हारी संवेदनाएँ मर चुकी हैं

तुम बस कवितायें मैन्युफैक्चर कर सकते हो,
उनमे मर्म नहीं ला सकते!

किसी की भावनाओं को
समझ नहीं सकते तुम

मतलबी हो गए हो...

इंसानियत मर चुकी
है तुम्हारी!

जो तुम मिल सकते हो बचपने के साथ तो कहो

जो तुम मिल सकते हो बचपने के साथ तो कहो
हमें दिक्कत है बड़प्पन से, बात समझो तो कहो

तुम देखो शक की निगाहों से औ’ देखूँ मैं तुम्हें
ये रिवाज़ कैसे निभाऊं मैं, कुछ और हो तो कहो

मैं तलबगार दोस्ती का तुम रिश्ते निभाते पैसों से
साथ रहना हो तो तुम बदलो, जो ना हो तो कहो

कैसे कह दूँ कि मैं खुश हूँ अजनबी से माहौल में
मुझे जंगलों-पहाड़ों में रहना, चलना हो तो कहो

तुम देखते नहीं जो विपदा वो देखता हूँ मैं हमेशा
“रिश्ते ज़ब्त-सपने ज़ब्त”; तुम्हें देखना हो तो कहो

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“अब लगता नहीं कि अपना बसेरा है इस गली
चलो ना,चलते हैं वहाँ जहाँ मोहब्बत हर डली”
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